Astrologer Dr. Naveen

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Tantra! It is such energy about everything feels less. It is difficult to find the words to explain tantra. It is such a science which helps a human to meet with their inner soul. A person comes to know about their soul. The word tantra is derived from “tattva” and “mantra”. The meaning of tattva is the science of cosmic energies and the meaning of mantra is science of sounds and vibrations. It means tantra is the light of knowledge which spread in our life. Tantra is such kind of the energy which makes the person complete. Our body is made from the 7 chakras.

  • Root Chakra (Muladhara)
  • Navel Chakra (Swadhisthana)
  • Solar plexus Chakra (Manipura)
  • Heart Chakra (Anahata)
  • Throat Chakra (Vishudda)
  • Third eye Chakra (Ajna)
  • Crown Chakra (Sahasarara)

The person who wants to awake their inner soul they do have to meditation and perception and it only happened when all the seven chakras work together. Many known rishi, muni and sages etc do such kind of the tantra to energize their body and soul fully.

Tantra Rahasya

One can attain the great power with the help of the tantra. There are many examples of the tantras in our ancient books and the Vedas. It is not easy to get that power. One must only get that with the guidance of the person who has also followed the same process of tantra and it is rare to find those people. There is only one among millions who can attain such siddhi.

  • Root Chakra (Muladhara): it is the base of the spine. This charkra is associated with the basic and materialistic needs of the person.
  • Navel Chakra (Swadhisthana): This chakra is placed in the lower abdomen. This chakra deals with the social and intimacy issues.
  • Solar plexus Chakra (Manipura): This chakra is placed in the stomach. It is responsible for the thinking, self confidence and ego etc like things.
  • Heart Chakra (Anahata): This is place at the centre of the heart. It is responsible for the feeling of love, joy, inner peace and self control etc.
  • Throat Chakra (Vishudda): It is placed in the throat region and it is responsible for the ability to speak truth, loyalty and trust etc.
  • Third eye Chakra (Ajna): It is placed on the forehead and between two eyes. It is responsible for the trusting on the intuitions.
  • Crown Chakra (Sahasarara): It is placed at the top of the head. It deals with the spirituality, intelligence and connection with god.

तंत्र के बारे में जितने लिखा जाय उतना कम है। तंत्र एक ऐसा ज्ञान है जो मनुष्य को अपने भीतर तक में जाता है तंत्र means system i.e मनुष्य को अपने ही शरीर की Knowledge जो करवा दे वो तंत्र है। " Tantra means to do a work in a systematic way “ . तंत्र एक ऐसी प्रकिया या प्रणाली है जो व्यकित को नर से नारायण बनाती है या यूँ कहूँ की पूणर्ता प्रदान करती है। भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप हमें ज्ञान देता है की किसी तरह से पूर्णता प्राप्ति के लिए पुरुष में स्त्रीतत्व और स्त्री में पुरुषत्त्व का होना कितना आवश्यक है . हमारी शरीर की सरचना में 7 चक्रों का वर्णन आया है।

  • मूलाधार चक्र
  • स्वाधिष्ठान चक्र
  • मणिपुर चक्र
  • अनाहत चक्र
  • विशुद्ध चक्र
  • आज्ञा चक्र
  • सहस्त्रार

व्यकित ध्यान , धारणा और समाधि के पथ पर इन सातों चक्रों के जाग्रित अवस्था की अनुभूति करता हुआ उस ईश्वर से (साक्षात्कार) करता है। बड़े -बड़े योगी - यति , सन्यासी , मुनि , तपस्वी भी अपनी कुण्डलनी को पूर्णता से जाग्रित करने के लिए कई प्रकार के योग का सहारा लेते है।

जिनमें प्रमुख्ता से हठ योग का नाम भी आता है।

मंत्र योग का मार्ग भी इसकी प्राप्ति में सहायक होता है।

सबसे प्रच्वलित और जाना माना मार्ग जो कुण्डलनी के रहस्य को सुलझाता है वो है शक्तिपात।

Tantra Rahasya

शक्तिपात वह तंत्र की उच्चतम प्रक्रिया है जिसके द्वारा कुण्डलनी को आसानी से और पूर्णता से जाग्रित किया जा सकता है। या यूँ कहूँ की ऐसे कई उदाहरण हमें ग्रथों में मिलते है। परन्तु शक्तिपात है क्या ????? कहा मिलता है ????? कौन दे सकता है। शक्तिपात सिर्फ एक सिद्ध व्यकितत्व ही दे सकता है i.e वो व्यकित जो स्वय उस मार्ग पर चला हो और सहस्त्रार को भेद चूका हो। कोई हजारों में एक सिद्ध और वो भी जब अपनी इच्छा से प्रसन्नता से शक्तिपात करता है तभी कुण्डलनी की परम अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है।

  • मूलाधार चक्र :- यह आधार भूत चक्र है। जहां से कुण्डलनी का प्रवेश संभव है। इसके जाग्रित होने पर materialistic चीजों की प्राप्ति संभव है जिसमे physiological needs या Basic need पूरी होती है प्रमुखता रोटी कपड़ा ,मकान , अच्छी नौकरी और जातक की अमीर या गरीब अवस्था की स्थिति भी मूलाधार पर आधारित है।
  • बीमारियां जैसे :- हड्डी या मांस से सम्बंधित , vitamin D या कैल्शियम की कमी , घुटनो या जोड़ो का दर्द , बवासीर , Arthritis आदि बिमारिया इस चक्र के activate होने पर ख़त्म हो जाती है।

  • स्वाधिष्ठान चक्र :- यह दूसरा चक्र है। किसी भी infections या बच्चा न होना या sugar problem को भी इस चक्र के activation पर ख़त्म किया जा सकता है।
  • मणिपुर चक्र :- Diabetic या पेट के area से संबधित सभी बिमारिया मणिपुर चक्र के जाग्रित होने पर ठीक हो जाती है।
  • अनाहत चक्र :- हृदय संबधित , धड़कन , ब्लाकेज आदि बिमारिया इस चक्र के activation पे ठीक होती है।
  • विशुद्ध चक्र :- सांस की बिमारी, T.B. , नुमोनिया, दमा , Thyroid आदि से related problems को दूर करता है।
  • आज्ञा चक्र :- मस्तिष्क से Related problems को दूर किया जा सकता है।
  • सहस्त्रार चक्र :- पाचन शक्ति और overall nervous system को ठीक किया जा सकता है।
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